अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त में एक अत्यंत गुढ़ और भावपूर्ण उद्घोष है— “माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः।“ अर्थात्, यह भूमि मेरी माता है और मैं इसका पुत्र हूँ। भारतीय दर्शन में राष्ट्र केवल मिट्टी, नदियों, पहाड़ों या सीमाओं से घिरा हुआ कोई भौगोलिक भूखंड मात्र नहीं है। राष्ट्र एक जीवंत इकाई है, एक स्पंदित चेतना है, जिसकी अपनी एक आत्मा है। महर्षि अरविंद ने कहा था कि भारत केवल एक भूमि का टुकड़ा नहीं है, बल्कि यह एक महान ईश्वरीय शक्ति है। जब हम इस दृष्टिकोण से अपने राष्ट्र को देखते हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि राष्ट्रहित से बड़ा कोई एजेंडा नहीं हो सकता और देशहित से बड़ा कोई स्वार्थ नहीं हो सकता।
किसी भी राष्ट्रभक्त और जागरूक नागरिक के लिए उसका देश उसकी निजी महत्वाकांक्षाओं, राजनीतिक पसंद-नापसंद, जाति, संप्रदाय और हर उस संकीर्ण वैचारिक मतभेद से अनंत गुना ऊपर होना चाहिए, जो समाज को बाँटने का काम करते हैं। जब-जब व्यक्तिगत स्वार्थ और अहंकार राष्ट्र की वेदी पर हावी हुए हैं, तब-तब इस देश ने अपने इतिहास में गहरे घाव सहे हैं। आज जब हम आधुनिक लोकतंत्र में जी रहे हैं, तब राष्ट्र की रक्षा का अर्थ केवल सीमाओं पर शस्त्र लेकर खड़ा होना नहीं रह गया है। आज का युद्ध वैचारिक है, और इस युद्ध में प्रत्येक नागरिक एक सैनिक है, जिसका सबसे बड़ा अस्त्र उसका ‘विवेक’ है।
इतिहास के पन्नों से: जब स्वार्थ ने राष्ट्र की पीठ पर खंजर घोंपा
इतिहास केवल अतीत की घटनाओं का संग्रह नहीं है; वह भविष्य के लिए एक चेतावनी है। भारतीय इतिहास इस बात का ज्वलंत प्रमाण है कि विदेशी आक्रांता कभी भी अपनी शक्ति के बल पर हमें पराजित नहीं कर पाए। भारत तब पराजित हुआ, जब उसके अपने ही लोगों ने व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और आपसी ईर्ष्या को राष्ट्रहित से ऊपर रखा।
आचार्य चाणक्य ने जब एक अखंड भारत का स्वप्न देखा था, तब उनके सामने छोटे-छोटे जनपदों में बँटा हुआ और आपस में लड़ता हुआ एक ऐसा समाज था, जो सिकंदर के आक्रमण के खतरे को भाँप नहीं पा रहा था। चाणक्य ने धनानंद के दरबार में अपमानित होने के बाद भी केवल और केवल राष्ट्र की रक्षा को अपना ध्येय बनाया। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब राष्ट्र पर संकट हो, तो व्यक्तिगत शत्रुता और सिंहासन का मोह त्याग देना चाहिए। चाणक्य का दर्शन सिखाता है कि शासक बदल सकते हैं, नीतियां बदल सकती हैं, लेकिन राष्ट्र की अखंडता से कोई समझौता नहीं हो सकता।
इसके विपरीत, जब हम मध्यकाल की ओर देखते हैं, तो जयचंद या मीर जाफर जैसे नाम केवल व्यक्ति नहीं, बल्कि उस दूषित मानसिकता के प्रतीक बन जाते हैं जहाँ निजी स्वार्थ के लिए विदेशी ताकतों को अपने ही घर का रास्ता दिखाया गया। जब-जब हम जातियों में, रियासतों में और व्यक्तिगत अहम् में बँटे, तब-तब हमने अपनी स्वतंत्रता गँवाई है। यह इतिहास चीख-चीख कर कहता है कि जो समाज अपने राष्ट्र को सर्वोपरि नहीं मानता, वह समाज बहुत जल्द अपना अस्तित्व, अपनी संस्कृति और अपनी स्वतंत्रता खो बैठता है।
आधुनिक कुरुक्षेत्र: सूचना और दुष्प्रचार का मायाजाल
आज के युग में कुरुक्षेत्र का स्वरूप बदल गया है। आज तलवारें और तोपें उतनी खतरनाक नहीं हैं, जितना खतरनाक वह अदृश्य युद्ध है जो सूचनाओं (इन्फॉर्मेशन) के माध्यम से लड़ा जा रहा है। इसे ‘फिफ्थ जनरेशन वॉरफेयर’ या मनोवैज्ञानिक युद्ध कहा जाता है। इस युद्ध का उद्देश्य किसी देश की सेना को हराना नहीं, बल्कि उस देश के नागरिकों के मन में अपनी ही संस्कृति, अपने ही संस्थानों और अपनी ही चुनी हुई व्यवस्थाओं के प्रति अविश्वास पैदा करना होता है।
लोकतंत्र में राजनीति और विचारों का मतभेद एक स्वाभाविक और स्वस्थ प्रक्रिया है। सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों ही लोकतंत्र के पहिए हैं। लेकिन, जब ‘विरोध’ के नाम पर कुछ संगठन, संस्थाएं या व्यक्ति तथ्यों की हत्या करने लगें, जब वे समाज में अविश्वास, अस्थिरता और घृणा का विष बोने लगें, तो उनसे सवाल पूछना हर नागरिक का राष्ट्रीय कर्तव्य बन जाता है।
चाहे वह कोई मानवाधिकार का चोला पहने हुए संगठन हो, कोई एनजीओ हो, कोई राजनैतिक पार्टी हो या कोई कथित सामाजिक संस्था या फिर कोई प्रेशर ग्रुप —किसी को भी यह विशेषाधिकार प्राप्त नहीं है कि वह राष्ट्रहित के साथ खिलवाड़ करे। अक्सर देखा गया है कि कुछ विदेशी सरकारें, वैश्विक संगठन और विदेशी अरबपति अपने भू-राजनीतिक (जियो-पॉलिटिकल) स्वार्थों को साधने के लिए दूसरे देशों में भारी-भरकम फंडिंग करते हैं। इस धन का उपयोग उन संगठनों को पोषित करने में किया जाता है, जिनका एकमात्र एजेंडा देश में अराजकता फैलाना, विकास परियोजनाओं को रोकना और सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करना होता है।
यह एक विडंबना है कि इस सुनियोजित मायाजाल में देश का ही एक वर्ग अनजाने में फँस जाता है। पढ़े-लिखे युवा, जो बदलाव लाना चाहते हैं, वे अक्सर इन भ्रामक नारों और गढ़े हुए विमर्शों (नैरेटिव) का शिकार हो जाते हैं। वे जाने-अनजाने में अपने ही देश की जड़ों में मट्ठा डालने वाले उन संगठनों के मोहरे बन जाते हैं, जिनका रिमोट कंट्रोल कहीं और बैठा कोई विदेशी आका दबा रहा होता है।
लोकतंत्र की शुचिता और वितंडावाद के विरुद्ध एक शंखनाद
आज, जब भारत अपनी नियति के एक अत्यंत महत्वपूर्ण शिखर की ओर कदम बढ़ा रहा है, तब कुछ शक्तियां हमारे ही लोकतंत्र के पवित्र प्रांगण में ‘वितंडावाद’ और अराजकता का विष बो रही हैं। एक जागरूक नागरिक के रूप में, यह हमारा दायित्व है कि हम इस षड्यंत्र के मूल चरित्र को पहचानें:
1. संवैधानिक संस्थाओं पर प्रहार और वितंडावाद का मायाजाल
आज हम देख रहे हैं कि कैसे देश की सर्वोच्च न्यायपालिका के शब्दों का भी राजनीतिकरण किया जा रहा है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने किसी एक विशिष्ट संदर्भ में कुछ लोगों के लिए ‘कॉकरोच’ शब्द का प्रयोग किया, लेकिन कुछ लोगों ने—जो सात समंदर पार अमेरिका से आकर, अपनी पार्टी बनाकर महत्वाकांक्षाओं की दुकान सजाए बैठे हैं—इसका दुर्भावनापूर्ण अर्थ निकालकर पूरे देश में एक कुत्सित वितंडा खड़ा कर दिया।
उनका उद्देश्य न्याय पाना नहीं है; उनका एकमात्र उद्देश्य हमारी उन संवैधानिक संस्थाओं को गालियां देना और उन्हें लांछित करना है, जिन पर इस देश का ढाँचा टिका है। हमें स्वयं से पूछना होगा—क्या दुनिया का सबसे बड़ा और परिपक्व लोकतंत्र ऐसे आधारहीन, शोर-शराबे वाले ‘वितंडावाद’ से चल सकता है? राष्ट्र का निर्माण तर्कों और संवाद से होता है, संस्थाओं को अपमानित करने वाले कुतर्कों से नहीं!
2. चुनाव सुधारों का विरोध और दुष्प्रचार का तंत्र
चुनाव लोकतंत्र का महापर्व हैं और एक पारदर्शी मतदाता सूची इसकी रीढ़ है। किसी भी जीवंत और ईमानदार व्यवस्था में यह अत्यंत आवश्यक है कि मृत या विस्थापित हो चुके मतदाताओं के नाम समय-समय पर सूची से हटाए जाएं, ताकि चुनाव की शुचिता और पवित्रता बनी रहे।
परंतु विडंबना देखिए कि आज कुछ संगठन ‘SIR’ जैसे अभियानों और भ्रामक नामों की आड़ में इस सामान्य, आवश्यक और पारदर्शी प्रशासनिक प्रक्रिया के खिलाफ भी फर्जी और भ्रामक प्रचार कर रहे हैं। सुधार की हर प्रक्रिया को ‘साजिश’ बताकर जनता में भ्रम फैलाना, वास्तव में लोकतंत्र की जड़ों में मट्ठा डालने का एक सुनियोजित प्रयास है।
3. न्यायपालिका पर विश्वास बनाम सड़क की अराजकता
लोकतंत्र में असहमति का सम्मान है, और यदि व्यवस्था में कहीं कोई त्रुटि है या किसी को अन्याय का आभास होता है, तो भारत के पास एक अत्यंत सशक्त, स्वतंत्र और निष्पक्ष न्याय व्यवस्था है। अगर कुछ गलत है, तो भारत की न्याय व्यवस्था उसे देखेगी। समाधान न्यायालय के कक्षों में और संवैधानिक मंचों पर तर्कों के आधार पर खोजे जाते हैं।
सड़कों पर उतरकर अराजकता फैलाना, देश को हिंसा की आग में झोंक देना, सार्वजनिक संपत्ति को जलाना और आम जनजीवन को ठप कर देना किसी भी समस्या का समाधान कैसे हो सकता है? जो लोग न्याय की आड़ में सड़कों पर आग लगाते हैं, वे न्याय के पैरोकार नहीं, बल्कि राष्ट्र की शांति के हत्यारे हैं।
4. विकास के रथ को रोकने और चुनी हुई सरकार को गिराने का षड्यंत्र
इन सभी सुनियोजित कुचेष्टाओं, दुष्प्रचारों और हिंसक प्रदर्शनों के पीछे का अंतिम सत्य क्या है? यह केवल नीतियों का विरोध या असहमति का स्वर नहीं है। कुछ लोग जानबूझकर एक चुनी हुई सरकार को उखाड़ कर फेंक देने की धमकी दे रहे हैं। यह अराजकता फैलाकर देश के विकास को बाधित करने की एक गहरी साज़िश है।
जब हमारा देश विकास के पथ पर तेज गति से दौड़ रहा है, जब दुनिया भारत की ओर आशा भरी दृष्टि से देख रही है, तब इन ताकतों का एकमात्र एजेंडा देश की प्रगति को रोकना और उसे अस्थिरता की बेड़ियों में जकड़ना है।
आलोचना, असहमति और राष्ट्रद्रोह के बीच की विभाजक रेखा
यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि सरकार से असहमति का अर्थ देश से गद्दारी नहीं है। भारतीय परंपरा में शास्त्रार्थ की महान संस्कृति रही है। यहाँ चार्वाक जैसे दर्शन को भी फलने-फूलने का अवसर मिला, जो पूरी तरह से ईश्वर और वेदों की सत्ता को नकारता था। लोकतंत्र में सरकार की नीतियों की आलोचना करना, उनसे असहमत होना और उनके खिलाफ आवाज उठाना हमारा जन्मसिद्ध और संवैधानिक अधिकार है। एक स्वस्थ लोकतंत्र बिना सशक्त विपक्ष और बिना मुखर आलोचना के जीवित नहीं रह सकता।
लेकिन, हमें उस सूक्ष्म विभाजक रेखा को पहचानना होगा जो ‘आलोचना’ और ‘दुष्प्रचार’ को अलग करती है। सरकार की आलोचना का उद्देश्य व्यवस्था को सुधारना, कमियों को उजागर करना और राष्ट्र को एक बेहतर दिशा में ले जाना होता है। इसके विपरीत, दुष्प्रचार का उद्देश्य केवल आग लगाना होता है।
असहमति की आड़ में जानबूझकर झूठे आँकड़े पेश करना, मंचों पर जाकर अपने ही देश की छवि को धूमिल करना, और समाज के विभिन्न वर्गों के बीच दंगे भड़काने वाली झूठी खबरें फैलाना कभी भी ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ का चोला नहीं पहन सकता। राजनीतिक पूर्वाग्रह में इतना अंधा हो जाना कि अपने ही देश के खिलाफ रचे जा रहे षड्यंत्रों का समर्थन करने लगें, यह एक अक्षम्य अपराध है। बिना सोचे-समझे, बिना तथ्यों की जाँच किए, केवल इसलिए किसी बात का समर्थन करना क्योंकि वह आपके राजनीतिक विरोधी के खिलाफ है, एक प्रकार की बौद्धिक आत्महत्या है।
एक जागरूक नागरिक का राष्ट्रधर्म: महाभारत से प्रेरणा
महाभारत के युद्ध में जब अर्जुन अपने ही परिजनों को सामने देखकर मोहग्रस्त हो गए थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें ‘स्वधर्म’ और ‘राष्ट्रधर्म’ का ज्ञान दिया था। कृष्ण ने स्पष्ट किया था कि जब धर्म और अधर्म का युद्ध हो, जब सत्य और असत्य का टकराव हो, तब तटस्थ रहना या पलायन करना सबसे बड़ा पाप है।
आज के संदर्भ में, जब राष्ट्र पर वैचारिक आक्रमण हो रहे हों, तब एक आम नागरिक का ‘राष्ट्रधर्म’ क्या है? देशभक्ति का अर्थ केवल स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस पर झंडा फहराना या आँखें बंद करके जयजयकार करना नहीं है। सच्ची देशभक्ति तो खुली आँखों से, सजग मस्तिष्क से राष्ट्र के हितों पर पहरा देना है।
आज समय आ गया है कि भारत का प्रत्येक नागरिक अपने भीतर के उस सोए हुए अर्जुन को जगाए और सत्य का गांडीव उठाए। यह गांडीव है—तर्क, तथ्य और ज्ञान का।
इसलिए, समाज में भ्रम का व्यापार करने वाले हर उस संगठन से, हर उस व्यक्ति से सीधे सवाल पूछिए:
- उनसे प्रमाण माँगिए: जब भी कोई भ्रामक दावा किया जाए, तो भावनाओं में बहने के बजाय उनसे तथ्य और स्रोत माँगिए।
- तथ्यों की कसौटी पर जाँच कीजिए: किसी भी सूचना को आगे बढ़ाने (फॉरवर्ड करने) से पहले उसकी सत्यता परखिए। आपका एक गलत फॉरवर्ड राष्ट्र की शांति भंग कर सकता है।
- झूठ का तार्किक खंडन कीजिए: जब आपको पता चले कि कोई विमर्श झूठा है, तो चुप मत रहिए। अपने तर्कों, अपने ज्ञान और अपने शब्दों के हथौड़े से उस झूठ के महल को ध्वस्त कीजिए।
- जवाबदेही तय कीजिए: विदेशी फंडिंग और राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों के आरोप की जाँच होनी चाहिए। जहाँ भी कानून की मर्यादा टूटती दिखे, वहाँ संवैधानिक दायरे में रहकर कठोरतम कार्रवाई की माँग कीजिए।
उठो, जागो और राष्ट्र के लिए खड़े हो
स्वामी विवेकानंद ने युवाओं का आह्वान करते हुए कहा था— “उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए।“ आज हमारा लक्ष्य एक ऐसे राष्ट्र का निर्माण है जो न केवल आर्थिक और सामरिक रूप से शक्तिशाली हो, बल्कि वैचारिक रूप से भी इतना सुदृढ़ हो कि कोई भी बाहरी या भीतरी शक्ति उसे खोखला न कर सके।
कोई भी राष्ट्र केवल अपनी भौगोलिक सीमाओं, ऊँची दीवारों या अत्याधुनिक हथियारों से सुरक्षित नहीं रहता। विश्व के कई शक्तिशाली साम्राज्य इसलिए ढह गए क्योंकि उनके नागरिक सो गए थे। एक राष्ट्र अपने नागरिकों की अंतरात्मा से, उनके प्रखर विवेक से और उनकी सतत जागरूकता से ही जीवित और सुरक्षित रहता है। रोम और यूनान की सभ्यताएं इसलिए नहीं मिटीं कि उनके पास धन या बल की कमी थी; वे इसलिए मिटीं क्योंकि उनके नागरिकों ने अपने राष्ट्र के प्रति अपना दायित्व भुला दिया था और वे विलासिता तथा व्यक्तिगत स्वार्थों में डूब गए थे।
जब समाज में व्यक्तिगत स्वार्थ और संकीर्ण राजनीतिक एजेंडे राष्ट्रहित को झुलसाने लगें, जब चुनी हुई सरकारों को अस्थिर करने के लिए विदेशी टूलकिट और देश-विरोधी नैरेटिव का सहारा लिया जाने लगे, तब मौन धारण करना कोई शराफत या विवेक नहीं है; यह शुद्ध रूप से कायरता है। अन्याय और झूठ को सहना, उसे फैलाने वाले का साथ देने के बराबर है। राष्ट्र के पक्ष में अडिग होकर खड़े होने का सीधा सा अर्थ है—बिना डरे सत्य के पक्ष में खड़े होना। फिर चाहे वह सत्य किसी शक्तिशाली व्यक्ति के खिलाफ हो, या आपकी अपनी राजनीतिक विचारधारा के प्रतिकूल ही क्यों न हो।
भारत आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। हमारी सभ्यता हजारों वर्षों के झंझावातों, आक्रमणों और संघर्षों को झेलकर भी अगर आज सीना ताने खड़ी है, तो इसलिए क्योंकि हर कालखंड में इस भूमि ने ऐसे बेटे और बेटियों को जन्म दिया है, जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर भी इस राष्ट्र की आत्मा को अक्षुण्ण रखा। आज हमें रक्त की आहुति नहीं देनी है; आज हमें अपने पसीने, अपने समय और अपनी बौद्धिक ऊर्जा की आहुति देनी है।
आइए, यह संकल्प लें कि हम किसी भी दुष्प्रचार का शिकार नहीं बनेंगे। हम किसी भी ऐसे एजेंडे को पनपने नहीं देंगे जो हमारे देश की अखंडता को चुनौती देता हो। हम अपने वैचारिक मतभेदों को राष्ट्र की चौखट के बाहर रखेंगे। जब बात भारत की आएगी, तो हम न किसी जाति के होंगे, न किसी संप्रदाय के, न किसी राजनीतिक दल के—हम केवल और केवल भारतीय होंगे।
अपने भीतर उस ऊर्जा को महसूस कीजिए जो इस महान राष्ट्र की मिट्टी से उठती है। अपने दायित्व को पहचानिए, क्योंकि यह देश आपकी ओर देख रहा है। यह राष्ट्र सर्वोपरि था, है और अनंत काल तक रहेगा—किसी भी व्यक्ति, संगठन, विचारधारा या राजनीतिक एजेंडे से बहुत ऊपर!
वंदे मातरम! जय हिंद!
✍️ Tejpal Singh





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